प्रमुख विकास कार्य

इन पांच सालों में कुछ बड़े विकासशील कार्यों का बखान

नवीन पेंशन योजना

इस नई पेंशन योजना  को डीसीआई नंबर के साथ पेंशन निदेशालय ने  जारी किया था। निदेशालय का उत्तरदायितत्व इस  परियोजना के तहत हजारों कर्मचारियों को  डीसीआई नंबर प्रदान करना  और उनके खातों  का हिसाब रखना था। वित्त विभाग को कुछ ऐसे  प्रावधान बनाने थे जिससे  पेंशन निदेशालय  द्वारा जारी कर्मचारियों की एनपीएस की मास्टर  फाइल को सीधे ट्रेज़री कम्प्यूटर पर अपलोड  किया जा सके। पेंशन निदेशालय के ट्रेज़ेरी  सिस्टम और एनपीएस सिस्टम के बीच एक  ऐसा इंटरफेस बनाया गया जिससे निदेशालय, ट्रेज़री सिस्टम द्वारा बनाई गई एनपीएस फ़ाईल को आसानी से सीधा प्रयोग कर सकता था। यह प्रक्रिया एनएसडीएल प्रक्रिया के आने से  पहले तक काफी सफलतापूर्वक चली थी।

छठा वेतन पेंशन आयोग रिवि़ज़न

उत्तर प्रदेश सरकार ने छठा वेतन आयोग जारी कर दिया। क्योंकि सारा काम कम्प्यूटर के जरिये होता था तो ट्रेज़री ने सारी आवश्यक्ताओं का ध्यान रखते हुए छठे वेतन आयोग के तहत अपने बहुत सारे वित्तीय बिलों में बदलाव किए। इस समय ट्रेज़री लगभग 100 से ज्यादा वर्ग के लोगों  को पेंशन दे रही है, जिसमें सिविल, केंद्रीय, रक्षा, अन्य राज्यों, रेलवे, एआईएस आदि के पेंशन धारक भी शामिल हैं। बाद में यह फैसला किया गया कि प्रत्येक पेंशन धारक की पेंशन पर अलग अलग विचार नहीं किया जाएगा बल्कि एक ऐसा सॉफ्टवेयर बनाया जाएगा जिससे कि हर वर्ग के पेंशन धारक की पेंशन और पेंशन की बकाया राशि पर आसानी से काम किया जा सके और सभी पेंशन धारकों को बिना ट्रेज़री आए उनकी पेंशन और एरियर मिल जाए। इस योजना को आसानी से चलाने के लिए सरकार ने आदेश जारी किया कि सभी वर्गों की एफएसडी लेवल पर जांच हो और उनके ज़रूरी मुद्दों को एनआईसी को दिया जाए जिससे कि सॉफ्टवेयर बनाया जा सके। एनआईसी ने सभी वर्गों के लिए  विशिष्ट रूप से निर्मित सॉफ्टवेयर बनाया जिन्हें जांच के बाद ट्रेज़ेरी को खंडों में सौंप दिया गया। इसके बाद 75 ट्रेज़री को यह सॉ़फ्टवेयर 50 खंडों में दिया गया जिसके बाद ट्रेज़री ने इस सॉफ्टवेयर पर सराहनीय काम किया। ट्रेज़री ने न केवल इसपर बिना किसी तकनीकी मदद के काम किया बल्कि पहली बार कम्प्यूटर द्वारा पेंशन और एरियर चुकाया।

छठे वेतन आयोग के तहत वेतन बिल तैयार करने के लिए आईपीएओ में संशोधन

गौरतलब है कि प्रदेश सरकार के तमाम विभाग अपने वेतन बिल किसी न किसी ट्रेज़री के तहत तैयार करते हैं जो कि एनपीएस कर्मचारियों के लिए अब अनिवार्य हो चुका था। अतः छठे वेतन आयोग के इस फैसले ने एक अत्यावश्यक जरूरत सामने ला कर खड़ी कर दी थी और वो ये कि वेतन बिल को तैयार करने में ग्रेड पे, पे बैन्ड्स, नए जीआईएस रेट्स, समान वेतन वृद्धि आदि में नए सिस्टम के हिसाब से तब्दीलियां की जाएँ। एजीयूपी की जरूरत के हिसाब से कई नई रिपोर्ट तैयार की गई और कई पुरानी रिपोर्टों में तब्दीलियां की गईं।

रसीद की ई-स्क्रॉल

बाद में कुछ समय के लिए ऐसी कोशिशें भी की गई जिससे कि बैंकों से ई-स्क्रॉल रसीद प्राप्त की जा सके और फिर ट्रेज़री कम्प्यूटर पर अपलोड किया जा सके। इस प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य था काम और समय की बचत जबकि चालान पोस्टिंग में ज्यादा समय लगता था। बैंकों ने इस प्रस्ताव को वापस कर दिया, हालांकि बैंकों ने इस सिलसिले में रसीद की सॉफ्ट कॉपी जारी की जिससे इस प्रक्रिया में थोड़ी राहत मिली। शुरुआती दौर में कुछ मुश्किलों के बाद अब यह योजना प्रभावी ढंग से कार्यरत है। 

एजी के साथ इंटरफेस

इसके अलावा एजीयूपी को इस बात के लिए राज़ी करने की भी कोशिश की गई कि वह ट्रेज़री के खातों के वाउचर की एंट्री करने के बजाय उनकी सॉफ्ट कॉपी को मंजूरी दें और उसे अपने सिस्टम पर अपलोड कर दें। आखिरकार एजी के और ट्रेज़री के सिस्टम के बीच इंटरफेस बनाया गया और अब एजी खातों की सॉफ्टकॉपी को स्वीकार कर रहा है।

बचत मॉ़ड्यूल का पतन

बचत मॉड्यूल के पतन को भी इसी दौर में आईटी ऑडिट के अनूकूल बनाया गया। इस मॉड्यूल के तहत सभी कोषागारों को अपने कोषागोर की बचत के पतन को दिखाना था और उसे कोषागार के स्तर पर बरकरार रखना था।

पासवर्ड योजना

आईटी ऑडिट के अनुकूल ही इस योजना को भी पेश किया गया। अब उपभोक्ता को पास्वर्ड की लंबाई और समय अवधि निश्चित कर दी गई थी। अगर उपभोक्ता निश्चित अवधि के में पास्वर्ड नहीं बदलता  है तो पासवर्ड की समय सीमा समाप्त हो जाती हैं।

आयकर के 24 G, 24Q प्रपत्र

आयकर विभाग ने एक नया नियम जारी किया। इस नियम के हिसाब से कोषागार में बिल और  चेक द्वारा किए गए भुगतान में डीडीओ द्वारा कर कटौती का ब्यौरा प्रपत्र 24G के तहत हर 3 महीने पर देना होता था। आयकर विभाग कोषागारों द्वारा दी गई जानकारी और डीडीओ द्वारा प्रपत्र 24Q में दी गई  जानकारी को मिलाना चाहता था। हाथों द्वारा ऐसी रिपोर्ट तैयार करना कोषागारों के लिए असंभव था इसलिए कोषागार के सॉप्टवेयर पर 24G का विकल्प जारी किया गया। कोषागारों के लिए 24Q का विकल्प भी जारी किया गया क्योंकि वो कोषागार कर्मचारियों, पेंशन धारकों और सेल्फ ड्रॉईंग अधिकारियों का कर काट रहा था जिस कारण 24Q की रिपोर्ट को हाथों द्वारा तैयार करना मुश्किल था।

एनएसडीएल द्वारा एनपीएस का अधिकार संभाला

नवीन पेंशन योजना जो अभी तक पेंशन निदेशालय  द्वारा चलायी जा रही थी अब एनएसडीएल के हाथों में चली गई थी। अब एनपीएस कर्मचारियों का पंजीकरण और उनके योगदान का ब्यौरा रखना सब एनएसडीएल ही संभाल रहा था। पुराने डीसीआई नंबर की जगह अब प्रैन का इस्तेमाल होना लगा था।  इस नई प्रक्रिया में सबसे बड़ा बदलाव यह हुआ कि एनएसडीएल उन 6000 डीडीओ से बात करने को नहीं तैयार था जो असल में कटौती करते थे। इसकी जगह एनएसडीएल ने 75 कोषागार केंद्र बनाए और उन्हें हर काम में शामिल किया। एनएसडीएल की वेबसाइट से उपभोक्ता की जानकारी की डाउनलोडिंग से लेकर उपभोक्ता और सरकार के योगदान की जानकारी को अपलोड करने तक का सारा काम अब एनएसडीएल का था। शुरुआती दौर में कोषागारों बनाए अनेकों परेशानियों का सामना करना पड़ा क्योंकि एनएसडीएल फाइलों का फॉरमेट बदलता रहता था और पूरी प्रक्रिया में कोषागारों को बहुत सी  दिक्कतों का सामना करना पड़ता था। काम को और अच्छे से करने के लिए एनएसडीएल, एनआईसी, पेंशन निदेशालय, कोषागार निदेशालय और एफएसडी ने कई बैठकें कीं, अंततः मीटिंग से फायदा हुआ और काम दोबारा से बेहतर तरीके से होने लगा।

एफएमआईएस-  केंद्रीय बजट आवंटन सिस्टम

केंद्रीय बजट आवंटन सिस्टम एक वेब आधारित आवंटन सिस्टम था जो कि केंद्रीय सर्वर से चलाया जा रहा था। इसे पेश करने का मुख्य उद्देश्य ये था कि बीसीओ और डीडीओ द्वारा बजट आवंटन में जो खामियां आ रही थीं उन्हें दूर किया जा सके। इस सिस्टम ने शुरुआती दौर में 26 वृत्तियों पर काम किया और फिर धीरे धीरे 1 अप्रैल 2013 तक लगभग सभी वृत्तियों पर इस सिस्टम के द्वारा काम होने लगा। इस सिस्टम में सभी एफसी और बीसीओ को खुद को बतौर सुपर यूज़र पंजीकृत कराना था जिसके बाद उन्हें एफएसडी से उन्हें उनका यूज़र आईडी और पासवर्ड मिल जाता था।  इस यूज़र आईडी के द्वारा सुपर यूज़र वेब आधारित सिस्टम एफएमआईएस पर लॉगऑन कर सकता था और ऑनलाईन आवंटन कर सकता था। इस सिस्टम का सबसे बडा फायदा यह था कि  इसके द्वारा किये गए आवंटन खुद ही आवंटित सर्वर पर चले जाते थे और कोषागार के सर्वर पर अपलोड हो जाते थे। इससे हाथों द्वारा किए जाने वाले आवंटन का लेखाजोखा बंद हो गया। इस योजना को लागू करने का जीओ 26 फरवरी 2013 तक जारी कर दिया गया था और सभी विभागों को इसकी ट्रेनिंग दी गई और यह निर्देश दिए गए कि आने वाले वित्तीय वर्ष 1 अप्रैल 2013 को सभी विभाग अपनी एफएसडी का पंजीकरण कर लें। इस योजना के तहत पुलिस और न्यायपालिका को भी शामिल किया गया और सभी उच्च न्यायालय के अफसरों को इलाहाबाद में ही ट्रेनिंग दी गई। इस विशाल योजना को एफएसडी ने बड़े आराम से समय सीमा के अंदर खत्म किया और फिर योजना का काम बिना किसी अड़चन के चलता रहा।

ई-भुगतान

अभी भी एनएसडीएल और एफएमआईएस जैसी योजनाओं पर काम चल रहा था कि सरकार ने अपनी एक और नई योजना लॉन्च करने की भूमिका बनाई, यह योजना थी ई-भुगतान की। इस योजना के तहत कोषागारों को अपने सभी भुगतान इंटरनेट के जरिए ही करने होते थे। शुरुआती दौर में एसबीआई द्वारा ई-भुगतान का जो प्रस्ताव पेश किया गया था उसका कोषागारों के सिस्टम से कोई लिंक नहीं था और एसबीआई नेट बैंकिंग द्वारा बनाई गई ट्रानजेक्शन आईडी को कोषागार सिस्टम में हाथों से ही दर्ज करना पड़ता था। इस खामी को पूरा करने के लिए कोषागार स्तर पर एक टोकन नंबर बनाया गया जो बिल रिसीविंग के समय जारी किया जाता था। यह टोकन नंबर दोनों सिस्टम के बीच एक लिंक का काम करता था। एनआईसी द्वारा एक और सॉफ्टवेयर बनाया गया जिसे डीडीओ इस्तेमाल कर सकते थें। इस सॉफ्टवेयर से लाभार्थियों की फाईल तैयार करनी होती थी जिसमें उनका खाता नंबर,ट्रानजेक्शन फाइल जिसमें बकाया रकम का ब्यौरा और सभी बिव के लिए बनाए गए टोकन नंबर की जानकारी देनी होती थी। सभी डीडीओ को यह निर्देश दिये गए कि वह बैंकों में अपना पंजीकरण कराये और नेट बैंकिंग के लिए अपना लॉगइन आईडी और पासवर्ड ले लें। इसके बाद एनआईसी सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करके डीडीओ को बेनिफीशरी और ट्रानजेक्शन फाईल बनानी होती हैं और उसे बैंक की वेबसाइट पर अपलोड करना होता हैं। कोषागार अफसर की अंतिम पुष्टि के बाद रकम लाभार्थी के खाते में क्रेडिट कर दी जाती है। ई-शासन प्रणाली के क्षेत्र में यह एक बहुत बड़ा कदम है। हालांकि इस सिस्टम में अभी भी बहुत सारी खामियां हैं जिन्हें दूर करना होगा।

यूपीएफएएस की वेबसाइट

कोषागार निदेशालय द्वारा यूपी फाईनेन्स और एकाउंट सर्विसेज़ की एक वेबसाइट बनाई गयी, जिसमें अफसरों के काम पोस्टिंग आदि की जानकारियां रहती है। अफसरों के एसीआर की जानकारी भी साइट पर मौजूद रहती है।

केंद्रीय सर्वर

इस समय यूपी के 78 कोषागार खुद की एप्लिकेशन और डेटा सर्वर पर केंद्रित तरीके से काम कर रहे हैं। हालांकि कोषागार का डेटा 'कोषवाणी' सर्वर पर हर घंटे अपलोड होता है फिर भी विकेंद्रित तरीके से काम करने में कुछ दिक्कतें आती हैं। इसी वजह से यह निर्णय लिया गया कि केंद्र सरकार की परियोजना के तहत कोषागार का एक केंद्रीय सर्वर होना चाहिए। नई योजनाएं जैसे ई-भुगतान और केंद्रीय बजट आवंटन सिस्टम पर भी एकीकृत तरीके से काम शुरु हुआ। एकीकरण सर्वर और बैकअप सर्वर के तहत जल्द ही काम शुरु हो जाएगा और विकेंद्रित तरीके से हो रहे कामों में आ रही अड़चनों से जल्द ही छुटकारा पाया जा सकेगा। एकीकृत तरीके से काम शुरु हो जाने के बाद मुख्यालय में बैठी सपोर्ट टीम पर बोझ कई गुना बढ़ जाएगा। इसलिए यह जरूरी है कि अफसरों की गठित टीम को इस स्तर पर मजबूत बनाया जाए कि वो किसी भी मुश्किल का सामना कर सके और बिना किसी रुकावट के काम चलता रहे।

ई-रसीद

अगली महत्वपूर्ण योजना ये है कि सरकारी कर, फ़ी और बाकी सारे भुगतान की सुविधा ऑनलाइन ही मिलने लगे और सरकारी रसीदों को एक वेब आधारित सिस्टम पर ही आसानी से प्राप्त कर सकें। आने वाले समय में इस योजना का लोग आसानी से लाभ उठा सकेंगे। ऊपरी बखान से यह साफ तौर पर ज़ाहिर होता है कि इस कार्यकाल में कोषागारों में कंप्यूटरीकरण और ई-शासन प्रणाली के क्षेत्र में कितना ज्यादा काम हुआ है, फिर भी अभी भी कई खामियां हैं जिन्हें दूर करके इस क्षेत्र में और काम करना होगा।